क्यों भगवा रंग में रंग गई अदिति सिंह, कैसे कांग्रेस के हाथ से रायबरेली भी गया

पंकज झा

अंततः रायबरेली की कांग्रेस विधायक अदिति सिंह ने कांग्रेस का हाथ झटक भाजपा का दामन थाम्ह लिया है. इसके पीछे की कहानी पता है आपको? कांग्रेस के ताबूत की अंतिम कील है रायबरेली. वह सीट जिसे अमेठी की तरह कांग्रेस अपने बाप की जायदाद समझती रही है. स्मृति इरानी ने अमेठी से उखाड़ा इन्हें और अब रायबरेली से अदिति ने.

हां, तो इसके पीछे की दिलचस्प कहानी याद दिलाता हूँ. जब छत्तीसगढ़ की लबारी (यानी झूठी) सरकार यह प्रचारित कर रही थी कि वह महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर सदन का विशेष सत्र आहूत कर रही है और ऐसा वह अकेली सरकार है जो कर रही है, उसी समय उत्तर प्रदेश में योगी जी की सरकार ने कांग्रेस से पहले विशेष सत्र तय किया हुआ था.

छत्तीसगढ़ में तो हास्यास्पद यह था कि सरकार से मुफ्त में मिले कपड़ों को पहन कर सत्र में भाग लेने के बावजूद भी बड़े-बड़े ‘माननीयों’ को यह तक नहीं पता था कि गांधी का जन्मदिन कब आता है. यह उजागर करने वाले पत्रकार को भी आगे पास देना बंद कर दिया गया था, यह खबर भी आयी. बहरहाल.

तो छत्तीसगढ़ में गाल बजाने वाली कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में बापू के आदर में आयोजित उस सत्र का बहिष्कार किया हुआ था. कल्पना कीजिये- कैसे लोग हैं ये. छत्तीसगढ़ में भाजपा समूचे आदर के साथ उसमें शामिल हुई जबकि उत्तर प्रदेश में ‘गांधी के कार्यक्रम’ का भी पंजा पार्टी ने बहिष्कार कर दिया था.

बस यही नागवार गुजरा था अति शिक्षित और आधुनिका, युवा नेता अदिति सिंह को. कांग्रेस के फरमान के बावजूद वे शामिल हुई गांधी जी की स्मृति में, समूचे आदर और सम्मान के साथ. असली गांधी बनाम कांग्रेस की उस जंग में अदिति ने असली गांधी का चयन किया. इसके बाद तो खैर, कांग्रेस से उनका जाना महज़ औपचारिकता ही थी. सीधे उन्होंने ‘खानदानी मालिक’ की हुक्मऊदूली की थी. महात्मा गांधी की जीत हुई, कांग्रेसियों की हार… और अदिति अब भाजपा की माननीया सदस्या है. स्वागत.

हां… कांग्रेस की डूबती नैया में एक ज़रा सी छेद इस निर्णय से पंजाब में भी हुई है. पता है आपको, अदिति के पति पंजाब से कांग्रेस विधायक हैं. अदिति वैसे भी अमेरिका से पढ़-लिख कर आयी हैं. भला किसी पढ़े-लिखों का कांग्रेस में क्या काम?

है कि नहीं?