मोदी ने किसान बिल वापस क्यों लिया ?

किसान बिल में कहीं कोई कमी नहीं थी सरकार विरोधी पत्रकार माने जाने वाले शेखर गुप्ता ने भी अपने लेख और वीडियो में इन तीनों कानूनों को किसानों की आजादी कहा था । शेखर गुप्ता ने लिखा था कि देश 1947 में आजाद हुआ लेकिन किसान दलालों और बिचौलियों से अब आजाद हुए हैं । सार्वजनिक मंचों और टीवी चैनल्स की डिबेट में भी किसान नेता ये नहीं बता पा रहे थे कि आखिरकार बिल में कमी क्या थी ? सिर्फ काल्पनिक डर दिखाकर किसानों को भड़काने की कोशिश की जा रही थी ? ऐसा हो जाएगा… वैसा हो जाएगा… जमीन बिक जाएगी… संपत्ति कुर्क हो जाएगी.. क्या क्या फर्जी बातें की जा रही थीं… सुप्रीम कोर्ट भी किसान नेताओं को फटकार लगाकर ये बोल चुकी थी कि अब किसान आंदोलन बंद करो क्योंकि किसान कानून तो वैसे भी लागू नहीं है तो आंदोलन की जरूरत ही क्या है ? इतना ही नहीं किसान नेता खुद भी बदनाम हो चुके थे क्योंकि लाल किला उत्पात प्रकरण और फिर दलित के हाथ पांव काटकर दिल्ली के बॉर्डर पर तड़पाकर यातना देकर मारा गया ! जनता की संवेदनाएं भी किसान आंदोलन के साथ नहीं थीं।

.ऐसे में सवाल ये उठता है कि फिर नरेंद्र मोदी ने अचानक कृषि बिल वापस लेने का फैसला क्यों लिया ?अंदर की बात ये है कि ग्लासगो जाने से पहले नरेंद्र मोदी ने मन में ये फैसला कर लिया था कि अब किसान बिल वापस ले लेंगे । लेकिन वो सही वक्त का इंतजार कर रहे थे । फरवरी में जब बीजेपी की कार्यकारिणी की बैठक हुई थी तब बीजेपी ने अपने लाए गए प्रस्तावों में कृषि बिलों को किसानों की आय दोगुनी करने वाला फैसला बताया था । लेकिन इस बार जो कार्यकारिणी की बैठक हुई उसमें बीजेपी ने अपने प्रस्ताव में किसान बिल पर एक लाइन भी नहीं लिखी थी । एक नवंबर को बीजेपी के किसान मोर्चा की बैठक होने वाली थी… उस बैठक को भी टाल दिया गया था । अब ये समझ में आ रहा है कि अचानक ये घटनाक्रम क्यों बदला ?

-दरअसल किसान बिल सरकार पहले ही स्थगित कर चुकी थी… यानी किसान बिल जमीन पर कहीं भी लागू ही नहीं था… सरकार किसान नेताओं से 10-12 राउंड की बात भी कर चुकी थी लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला था । किसान आंदोलन में कोई दम नहीं था लेकिन विपक्ष के पास ये कहने के लिए बचा हुआ था कि सरकार किसान विरोधी है और तीनों किसान बिल काले कानून हैं ! बीजेपी के रणनीतिकारों ने इस पर मंथन किया कि जब किसान कानून लागू ही नहीं है… तो भी सरकार की बदनामी करने की कोशिश की जा रही है ! इसलिए कानून वापस लेकर विपक्ष से ये हथियार भी छीन ही लेना चाहिए ।

-बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द पंजाब रहा क्योंकि पंजाब में मूल रूप से बीजेपी का कोई बड़ा जनसमर्थन और जनाधार नहीं है वहां क्षेत्रीय दलों और क्षेत्रीय नेताओं का ही वर्चस्व है… बीजेपी कैप्टन अमरिंदर सिंह से गठबंधन करना चाहती थी लेकिन गठबंधन के पहले अमरिंदर सिंह ने शर्त रख दी कि बीजेपी किसान कानून वापस ले ले । अब इस फैसले के साथ ही बीजेपी का अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन का रास्ता साफ हो चुका है । इसके अलावा अकाली दल के साथ भी दोबारा गठबंधन का रास्ता साफ हो चुका है… सबसे बड़ी बात ये कि ये फैसला गुरु पर्ब के दिन लिया गया यानी साफ कहा जा सकता है कि ये एक तरह से पंजाब के चुनाव को देखते हुए मोदी का चुनावी फैसला है !

-एक और बड़ी बात ये भी है कि इस किसान आंदोलन की आड़ में देशद्रोही और खासकर खालिस्तानी ताकतें देश में अशांति पैदा करने की लगातार कोशिश कर रही थी । सिखों और हिंदुओं के बीच में एक दरार पैदा करने की कोशिशें भी की जा रही थीं । सरकार को उम्मीद है कि अब इस फैसले के वापस होने के बाद देशद्रोहियों की साजिशें खत्म होंगी ।

-एक और बहुत बड़ा मुद्दा है जो इस फैसले के लिए जिम्मेदार है । क्लाइमेट चेंज आज एक बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है । नवंबर चल रहा है लेकिन अब भी कहीं कहीं बारिश हो रही है । जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती में फायदा लगातार घटता जा रहा है । क्योंकि किसानों की फसल बेमौसम बारिश से बर्बाद हो रही हैं… आज की तारीख में हालत ये है कि किसान फसल बो रहा है लेकिन निश्चित रूप से ये नहीं कह सकता है कि उसे फायदा होगा या नहीं ? ओला-बेमौसम बारिश ने कृषि को एक अनिश्चित पेशे में तब्दील कर दिया है सरकार ये कहती है कि रिकॉर्ड खेती हो रही है… ये बात सही है लेकिन देश के 80 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं और उनके लिए आज भी खेत में लगाए गए 10 हजार रुपए निकाल लेना एक बड़ी चुनौती है !

-पहले पेट्रोल के दाम कम करना, फिर कृषि कानून वापस लेना, सरकार और भी कई बड़े फैसले ले सकती है जो चुनाव से प्रभावित हो सकते हैं और चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं !

-सरकार के पास पूरी मशीनरी और खुफिया रिपोर्ट होती है… रॉ जैसी एजेंसियां जनता के बीच का माहौल पता करने की क्षमता रखती हैं… सरकार ने सोच समझकर ही अपने पांव वापस खींचे होंगे ।

अगर यूपी में हार हुई तो सेंटर भी हाथ से निकल ही जाएगा । इसीलिए यूपी को बचाना ही मोदी सरकार की पहली बड़ी प्राथमिकता है !

आप सहमत या असमहत हो सकते हैं.. ये बात भी सच है कि इससे मोदी को सपोर्ट करने वाले और विरोधियों का हौसला भी टूटा है…लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि हर बार तलवार की नहीं सुई की भी जरूरत होती है।।
कूटनीति हर किसी के बस की बात नहीं।।